उनका 'स्मार्ट सुरक्षा सिस्टम' अब शहर की धमनियों में दौड़ रहा था।
नीलगढ़ का सबसे शातिर अपराधी गिरोह, जिसे 'काला साया' कहा जाता था, शहर के सबसे बड़े बैंक को लूटने की योजना बना रहा था।
इस लूट के पीछे शहर के सबसे ताकतवर व्यक्ति का हाथ था—जिसे सब 'बड़े साहब' कहते थे। बड़े साहब ही पुलिस विभाग के असली कर्ता-धर्ता थे। लूट की हर बड़ी चोरी का एक बड़ा हिस्सा उनके पास जाता था।
उस रात, जब अपराधी बैंक के अंदर दाखिल हुए, अजय ने अपने लैपटॉप पर हरकत देखी।
"विक्रम, देखो! बैंक के पिछले गेट पर हलचल है," अजय चिल्लाया।
हेमन्त ने तुरंत अपनी कोडिंग सक्रिय की। "अलर्ट भेज दिया है। पुलिस को सीधे सूचना मिल गई है।"

बिना किसी देरी के, पुलिस की गाड़ियाँ बैंक के पास पहुँच गईं। अपराधियों को पकड़ा गया और बैंक लूट की योजना विफल हो गई। बड़े साहब,
जो अपने घर पर इस लूट के हिस्से का इंतज़ार कर रहे थे, यह खबर सुनकर आगबबूला हो गए।
---
अगले दिन, बड़े साहब ने अपने खास आदमियों को बुलाया। "बैंक लूट कैसे नाकाम हुई? वहाँ कोई गार्ड नहीं था, फिर भी पुलिस पहुँच गई।
पता लगाओ, यह किसका काम है!"
बड़े साहब का दिमाग बहुत तेज था। उन्होंने खुद तहकीकात शुरू की। उन्हें पता चला कि पुलिस के पास कोई गोपनीय सूचना नहीं थी,
बल्कि किसी ने अपने निजी नेटवर्क से उन्हें सूचित किया था। उन्होंने शहर के पुराने बिजली के खम्बों और तारों की जाँच शुरू की। उन्हें कुछ अजीब डिजिटल सिग्नल मिले जो एक छोटे से अपार्टमेंट की ओर जा रहे थे।
उधर, तीनों दोस्तों को आभास हो गया था कि कोई उनका पीछा कर रहा है।
अजय ने कहा, "दोस्तों, बड़े साहब चुप नहीं बैठेंगे। उन्हें पता चल गया है कि कोई सिस्टम काम कर रहा है।
हमें अभी यहाँ से सब कुछ हटाना होगा।"
हेमन्त ने घड़ी देखी। "हमारे पास बस एक घंटा है। वे रास्ते में ही हैं।"
तीनों ने बिजली की गति से काम किया। उन्होंने अपने मुख्य सर्वर को पहले ही छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दिया था।
उन्होंने सारा डेटा क्लाउड पर शिफ्ट किया और अपने हार्डवेयर को ऐसे छिपाया कि कोई न देख सके।
---
###
कुछ ही देर में बड़े साहब अपनी वर्दीधारी टीम के साथ उस अपार्टमेंट के दरवाज़े पर थे। उन्होंने लात मारकर दरवाजा तोड़ा। "बाहर निकलो! मुझे पता है तुम यहीं हो!"
अजय, विक्रम और हेमन्त बड़े इत्मीनान से मेज़ पर बैठकर चाय पी रहे थे। बड़े साहब ने पूरे घर की तलाशी ली।
उन्होंने कंप्यूटर खंगाले, अलमारी खोजी, लेकिन वहाँ सिर्फ कुछ पुरानी किताबों के अलावा और कुछ नहीं मिला।
बड़े साहब गुस्से से कांपते हुए अजय के पास आए और उसका कॉलर पकड़ लिया।
"वो सिस्टम कहाँ है? वो कोड कहाँ है? मुझे पता है तुमने बैंक वाली बात को अंजाम दिया है।"
विक्रम ने शांति से जवाब दिया, "बड़े साहब, हम तो बस एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे, लेकिन वह सफल नहीं हुआ,
इसलिए हमने उसे डिलीट कर दिया। आपको गलतफहमी हुई है।"

बड़े साहब की नज़रें पूरे कमरे में घूम रही थीं। उन्होंने दीवारों को थपथपाया, फर्श देखा, लेकिन सिस्टम का कोई नामो-निशान नहीं था।
सिस्टम तो अब दुनिया के किसी और कोने में एक सुरक्षित सर्वर पर काम कर रहा था, जहाँ से उसे कोई नहीं मिटा सकता था।
बड़े साहब हार मानकर रह गए। उनके पास कोई सबूत नहीं था। उन्हें लगा कि शायद वे वाकई गलत थे।
वे झल्लाहट में वहां से निकल गए। उनके जाने के बाद हेमन्त हंसा, "अब वो कभी नहीं जान पाएंगे कि उनका पूरा साम्राज्य अब हमारे एक क्लिक की दूरी पर है।"
तीनों दोस्त बच गए थे। बड़े साहब हाथ मलते रह गए, लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी। बड़े साहब की नजरें अब और भी खतरनाक तरीके से इन तीनों पर टिक गई थीं।
---
शेष अगले भाग मे---
💬 Comments (0)
अपनी राय दें