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सेवा, प्ररिश्रम,ओर प्रयास Care, Hard work and Effort

📅 10 Jul 2026
# **जेब खर्च से शुरू हुआ सपना**

उत्तर भारत के सुंदर शहर **सूर्यपुर** में एक परिश्रमी कैब चालक **रामदास** अपने परिवार के साथ रहता था।
उसके परिवार में उसकी पत्नी **सावित्री** और बारह साल का बेटा **दीपक** था।
दीपक पास के **सरस्वती विद्या मंदिर** में सातवीं कक्षा में पढ़ता था। वह पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह थी कि वह अपने पिता की हर छोटी बात को ध्यान से सुनता था।

हर सुबह रामदास सूरज निकलने से पहले अपनी कैब लेकर निकल जाता।
दिन भर शहर की सड़कों पर यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाता और रात होने पर घर लौटता। चेहरे पर मुस्कान रहती,
लेकिन शरीर पूरी तरह थक जाता।

घर आते ही वह अक्सर एक ही बात कहता।

"आज फिर कमर टूट गई। यह सीट बहुत सख्त है। पूरे दिन बैठने से पीठ में बहुत पीडा होता है।"

दीपक चुपचाप यह बात सुनता रहता। उसने देखा कि उसके पिता कई बार गाड़ी से उतरते समय धीरे-धीरे चलते हैं।
कभी पीठ पकड़ते, तो कभी कमर सीधी करने की कोशिश करते।

एक दिन दीपक ने पूछा,
"पिताजी, नई सीट क्यों नहीं लगवा लेते?"

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रामदास ने प्रसन्नता से कहा,
"बेटा, अच्छी सीट बहुत महंगी आती है। पहले घर का खर्च चलता रहे, यही बड़ी बात है।"

उस दिन से दीपक के मन में एक नया विचार आया।

उसने तय किया कि वह अपने पिता के लिए ऐसी सीट बनाएगा, जिस पर बैठकर उन्हें पीडा न हो।

दीपक को हर महीने थोड़ा जेब खर्च मिलता था। पहले वह उससे खिलौने, मिठाई और छोटी-छोटी चीजें खरीदता था। अब उसने सब बंद कर दिया।

उसने एक पुराना डिब्बा लिया और उसमें पैसे इक्ठा करने लगा।

उसके मित्र नई गेंद खरीदते, मेले में जाते और ठंडी मिठाई खाते, लेकिन दीपक हर बार प्रसनता से मना कर देता।

धीरे-धीरे उसके डिब्बे में पैसे बढ़ने लगे।

स्कूल से लौटने के बाद वह घर के पुराने गद्दे, रुई, कपड़ा और फोम के टुकड़ों को ध्यान से देखने लगा। वह समझना चाहता था कि कौन-सी चीज बैठने में सबसे ज्यादा आराम देती है।

उसने कई छोटे नमूने बनाए।

पहला प्रयास बहुत नरम था। बैठते ही शरीर नीचे धँस जाता था।

दूसरा बहुत कठोर था।

तीसरा कुछ अच्छा था, लेकिन लंबे समय तक बैठने पर सुख नहीं मिलता था।

हर बार वह आप बैठकर देखता और फिर बदल देता।

कई महीने बीत गए।

एक दिन उसके इक्ठा किए हुए पैसों से उसने बाजार से अच्छा फोम, ठोस कपड़ा और कुछ जरूरी सामान खरीदा।

अब उसने पूरे मन से नई सीट बनानी शुरू की।

उसने सीट में अलग-अलग जगह पर अलग मोटाई का फोम लगाया।
बीच का हिस्सा थोड़ा ठोस रखा और किनारों को नरम बनाया।
ऊपर ऐसा कपड़ा लगाया जो गर्मी में भी ज्यादा गर्म न हो।

तीन दिन की परिश्रम के बाद सीट तैयार हो गई।

रात को उसने अपने पिता से कहा,

"पिताजी, कल सुबह गाड़ी में बैठने से पहले मेरी बनाई सीट लगा लेना।"

रामदास ने हँसते हुए कहा,
"अरे, मेरे छोटे कारीगर ने सीट भी बना दी?"

सुबह दीपक ने सीट कैब में लगा दी।

रामदास पूरे दिन यात्रियों को लेकर नगर में घूमता रहा।

शाम को जब वह घर लौटा, उसके चेहरे पर अलग ही खुशी थी।

जैसे ही उसने गाड़ी रोकी, वह तेजी से घर के अंदर आया।

"दीपक, आज पहली बार पूरा दिन बैठने के बाद भी कमर में पहले जैसा पीडा नहीं हुआ।
यह सीट सच में बहुत सुख देती है।"

दीपक की आँखों में प्रसन्नता चमक उठी।

कुछ दिनों बाद एक यात्री कैब में बैठा।

उसने सफर पूरा होने पर कहा,

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"भाई, आपकी सीट बहुत सुखद है। यह कहाँ से खरीदी?"

रामदास ने प्रसनता से कहा,

"इसे मेरे बेटे ने बनाया है।"

यात्री ने तुरंत कहा,

"मेरी गाड़ी के लिए भी ऐसी ही एक सीट बना दीजिए।"

यहीं से सब बदलना शुरू हुआ।

धीरे-धीरे और लोग भी ऐसी सीट माँगने लगे।

दीपक स्कूल की पढ़ाई के बाद शाम को एक-एक सीट बनाता।

अब उसके जेब व्यय से नहीं, बल्कि सीट बेचकर पैसे आने लगे।

उसने हर धन का लेखा-जोखा लिखा।

कुछ समय बाद उसने बेहतर उपकरन खरीदे।

फिर उसने दो लोगों को अपने साथ काम पर रखा।

काम बढ़ता गया।

अब हर सीट पहले से भी अच्छी बनने लगी।

दीपक हमेशा हर नई सीट खुद बैठकर जाँचता।

यदि उसे थोड़ा भी लगता कि कहीं सुधार हो सकता है, तो वह फिर से बदल देता।

उसकी एक ही बात थी,

"जो चीज मेरे पिता को आराम दे सकती है, वही दूसरे चालकों को भी मिलनी चाहिए।"

धीरे-धीरे आसपास के कई शहरों से भी लोग सीट मँगाने लगे।

एक दिन एक बड़ी यात्रा सेवा चलाने वाले व्यक्ति ने एक साथ सौ सीटों का आदेश दिया।

यह दीपक के लिए बहुत बड़ा मौका था।

उसने परिश्रम बढ़ा दी।

अब एक छोटे कमरे की जगह उसने एक बड़ा कार्य स्थल लिया।

वहाँ कई लोग काम करने लगे।

हर नई सीट बनने से पहले उसकी ठोसी, आराम और टिकाऊपन की जाँच होती।

कुछ ही वर्षों में दीपक ने अपनी सीट बनाने की बड़ी इकाई शुरू कर दी।

उसकी बनाई सीटें देश के कई नगरो में जाने लगीं।

सब लोग कहते,

"अगर लंबा सफर करना है, तो दीपक की सीट सबसे अच्छी है।"

एक दिन उसी **सरस्वती विद्या मंदिर** ने दीपक को बच्चों से बात करने के लिए बुलाया।

दीपक मंच पर पहुँचा।

उसने बच्चों से कहा,

"मैंने कोई बड़ा काम करने का सपना नहीं देखा था। मैंने केवल अपने पिता का पीडा कम करने की कोशिश की थी।
जब मन साफ हो और परिश्रम सच्ची हो, तो छोटा काम भी बहुत बड़ा बन सकता है।"

सभा में बैठे सभी बच्चों ने तालियाँ बजाईं।

कार्यक्रम के बाद रामदास अपने बेटे के पास आया।

उसकी आँखें प्रसनता से भर गई थीं।

उसने कहा,

"बेटा, पहले मैं लोगों को उनकी गंतव्या तक पहुँचाता था। आज तुमने मेरी परिश्रम को नई पहचान दे दी।"

दीपक ने प्रसनता से अपने पिता का हाथ पकड़ लिया।

उसने कहा,

"पिताजी, यह सब आपकी परिश्रम की कमाई है। अगर मैंने प्रतिदिन आपको परिश्रम करते और फिर भी प्रसन्नता नहीं देखा होता,
तो संभवतय मुझे यह सोच कभी नहीं आती।"

उस दिन पूरे **सूर्यपुर** में दीपक की चर्चा थी।

लोग केवल उसकी बनाई सुखद सीट की नहीं, बल्कि उस बेटे की भी बात कर रहे थे
जिसने अपने जेब खर्च से बचाए गए छोटे-छोटे पैसों से अपने पिता का पीडा कम करने का सपना देखा
और उसी सपने को परिश्रम से एक बड़ी पहचान में बदल दिया।

। कहानी समाप्त ।
💡 सीख: दूसरों की परेशानी को समझकर किया गया छोटा प्रयास भी एक दिन बड़ा बदलाव ला सकता है। परिश्रम, धैर्य और अपने परिवार के लिए किया गया सच्चा काम कभी व्यर्थ नहीं जाता।
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