उनका सर्वर अब किसी एक जगह नहीं, बल्कि कई जगह बिखरा हुआ था। 'बड़े साहब' अभी भी अपमान की आग में जल रहे थे।
उन्हें शक था कि ये तीनों लड़के ही उनके पीछे हैं, लेकिन सबूत न होने के कारण वे कुछ नहीं कर पा रहे थे।
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बड़े साहब की बेटी, पूजा, जो दिल्ली से पढ़कर आई थी, अपने पिता के काम करने के तरीके से नफरत करती थी।
वह जानती थी कि उसके पिता भ्रष्ट हैं। पूजा ने एक दिन अपने पिता के लैपटॉप में कुछ फाइलें देखीं, जिसमें नीलगढ़ और विशाखापुर के अपराधों का काला चिट्ठा था।
उसने आस पास लोगो से पूछा तो सभी ने तीन बहादूर मित्रो का नाम बताया।
उसने मौका मिलते ही अजय और उसके दोस्तों से संपर्क करने का फैसला किया। पूजा ने कोडिंग की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई थी,
इसलिए वह जानती थी कि ये तीनों दोस्त कौन हैं। उसने चुपके से अजय को एक एनक्रिप्टेड मैसेज भेजा: *"तुम्हारे सिस्टम की जड़ें कमज़ोर हैं,
उसे और मजबूत करने की ज़रूरत है। मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूँ।"*
पहले तो अजय और दोस्तों को लगा कि यह बड़े साहब की कोई चाल है, लेकिन पूजा के दिए गए तकनीकी सुझावों ने उनके सिस्टम को 'अजेय' बना दिया।

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अजय, विक्रम और हेमन्त ने अब एक नया जाल बिछाया। उन्होंने विशाखापुर के मुख्य हाईवे पर ड्रग्स की एक बड़ी तस्करी पकड़ी।
जैसे ही ट्रक ने सीमा पार की, उनके सिस्टम ने विशाखापुर की पुलिस को तुरंत लोकेशन भेज दी। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर ट्रक जब्त कर लिया।
अगले हफ्ते, उन्होंने नीलगढ़ के ही एक बड़े सरकारी टेंडर घोटाले का पर्दाफाश किया। यह घोटाला सीधे बड़े साहब के इशारे पर हो रहा था।
बड़े साहब आगबबूला हो उठे। उन्होंने अपने हैकर्स की पूरी टीम को आदेश दिया: "किसी भी कीमत पर इन तीनों का पता लगाओ, मुझे इनके निजी डेटा, घर का पता, सब चाहिए!"
बड़े साहब के हैकर्स ने दिन-रात एक कर दिए। उन्हें लगा कि उन्होंने उन तीनों के आईपी एड्रेस (IP Address) को ट्रैक कर लिया है।
बड़े साहब अपनी पुलिस टीम लेकर उस जगह पहुँचे, लेकिन वहाँ फिर से कुछ नहीं मिला। असल में,
पूजा ने अपने पिता के ही सिस्टम में एक 'रिवर्स प्रॉक्सी' डाल दी थी, जिससे वे अपनी ही पुलिस को गोल-गोल घुमा रहे थे।
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बड़े साहब ने एक आखिरी दांव खेला।
उन्होंने शहर की सबसे बड़ी तिजोरी वाली जगह पर एक फर्जी लूट का नाटक रचा ताकि वे तीनों अपना सिस्टम वहां इस्तेमाल करें और पकड़े जाएं।
पूजा ने इस चाल को भांप लिया।
उसने अजय से कहा, "पिताजी तुम्हें उसी के गढ़ में फंसाना चाहते हैं।
क्यों न हम उनके ही घर को अपना केंद्र बना लें? उनके निजी सर्वर रूम में ही अपना 'मुख्य नोड' (Main Node) फिट कर देते हैं।"
यह पागलपन भरा आईडिया था, लेकिन यही एकमात्र तरीका था।
पूजा ने अपने पिता के घर का लेआउट और सिक्योरिटी कोड अजय को दे दिए। एक रात, जब बड़े साहब शहर से बाहर एक बड़ी मीटिंग के लिए गए थे,
अजय और हेमन्त उनके घर के पिछले दरवाज़े से अंदर दाखिल हुए।
विक्रम ने बाहर से फायरवॉल को संभाल रखा था। दो घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद, उन्होंने बड़े साहब के मुख्य सर्वर रूम में अपना छोटा सा चिपसेट फिट कर दिया।
अब बड़े साहब का हर कॉल, हर ईमेल, और हर भ्रष्ट लेनदेन सीधे अजय के सिस्टम पर लाइव दिख रहा था।
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बड़े साहब वापस आए और विशाखापुर के एक माफिया से फोन पर बात कर रहे थे।
उन्होंने कहा, "अगली खेप विशाखापुर बॉर्डर से रात को 2 बजे निकलेगी, सुरक्षा का इंतज़ाम पक्का रखना।"
जैसे ही उन्होंने फोन रखा, अजय के सिस्टम ने यह पूरी कॉल रिकॉर्ड की और उसे विशाखापुर की एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) को भेज दिया।
अगली रात, जब बड़े साहब के आदमी अपनी गाड़ी में माल लेकर विशाखापुर की ओर बढ़े, उन्हें लगा सब ठीक है।
लेकिन बॉर्डर पर पहुँचते ही विशाखापुर की पुलिस ने उन्हें घेर लिया। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब पुलिस ने सीधे बड़े साहब के घर पर छापा मारा।
बड़े साहब अश्चर्या चकित थे! "तुम लोग यहाँ कैसे आए? मैंने तो सब सुरक्षित रखा था!"
पुलिस अधिकारी ने मुस्कुराते हुए कहा, "हमें तो आपकी हर हरकत की लाइव फीड मिल रही थी।
यह सिस्टम किसने बनाया, यह हमें नहीं पता, लेकिन आपके पास जो माल मिला है, वह आपको उम्रकैद दिलाने के लिए काफी है।"

बड़े साहब का चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने अपनी मेज़ पर हाथ मारा, कमरे की तलाशी ली,
लेकिन वहां उन्हें वो चिप नहीं मिली जो अजय ने फिट की थी—क्योंकि अजय ने उसे बड़ी चालाकी से हटा लिया था, जैसे ही काम पूरा हुआ।
बड़े साहब हाथ मलते रह गए, चिल्लाते रह गए, लेकिन पुलिस उन्हें हथकड़ी पहनाकर ले गई।
पूजा दूर खड़ी होकर यह सब देख रही थी। उसने मुस्कुराते हुए अपने लैपटॉप पर एक आखिरी कमांड दी—'सिस्टम ऑफलाइन'।
नीलगढ़ और विशाखापुर दोनों अब सुरक्षित थे। तीनों दोस्तों ने अपना काम पूरा कर लिया था और बड़े साहब अपने ही जाल में फंसकर बर्बाद हो गए थे।
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